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रंग एक ऐसा

 रंग एक ऐसा रंग एक उम्मीद का जो पंख  लगाकर पक्षियों संग उड गया...|1| रंग एक विश्वास का जो रिश्तों को अटूट बंधन में बांध गया...|2| रंग एक सविधान का जो  भेदभाव का कंलक धों गया...|3| रंग एक आशा का जो  असफलता को सफल कर गया...|4| रंग एक प्रेम का जो  संसार को स्वर्ग बना गया...|5| रंग एक बरसात का जो धरती को हरियाली दे गया...|6| रंग एक अच्छाई का जो बुराई को हरा गया...|7| रंग एक स्वभिमान का जो अभिमान से जीना सीखा गया...|8| रंग एक सयंम का जो क्रोध में भी शांति दे गया...|9| रंग एक देश का जो लहू वीर का पी गया...|10|I  रंग एक प्रीत का जो मनमीत पर छा गया...|11| रंग एक सपने का जो हकीकत में बदल गया...|12| रंग एक सच्चाई का जो ईमानदार बना गया...|13| रंग एक गरीबी का जो हर दम नीचा दिखाता गया...|14| रंग एक माँ की ममता का जो खुशियों का दामन भर गया...|15| रंग एक दोस्ती का जो दुश्मनी निकाल गया...|16| रंग एक संस्कार का जो  माता -पिता का परिचय दे गया...|17| रंग एक पिता की बेबसी का जो अपनी बेटी को विदा कर गया...|18| रंग एक प्रकृति का जो निरंतर अपने नियमों पर चलता गया...|19| रंग ...

"आखिर क्यों"

 आखिर क्यों तोड़कर उस डाली से फूल क्यों वो लोग अपने घर ले जातें है...! होकर जुदा अपनी परछाई से भला किस तरह वो माँ बाप रह पातें है...!! सोचकर उस बात को  लबों पर लाना हम तो घबरा जातें है...! ज्यादा बोलकर क्यों वो  अपनी सीमा तोड़ जातें है...!! शिक्षा का अर्थ, है नहीं  किसी जात पात से, फिर भेदभाव की शिक्षा  कहा से वो लातें है...! सुनकर किसी गैर की बात को अपनों से नाता वो तोड़ जातें है...!! छाया में बैठकर क्यों वो उस पेड़ की कीमत भुल जातें है...! लेकर हाथों में अपने कुल्हाड़ी रोज रोज दर्द देने आ जातें है...!! बनावट तो एकसमान है सभी की,  फिर ये कौन सी छाप धर्म की  अपने शरीर पर ले आते है...! देखतें है प्रतिदिन  खुद को दर्पण में,  क्या वो कभी एक दिन  खुद को खुद से मिलाते है...!! पार कर इंसानियत  की सलतनत को, ये ऊच निच का जलजला  कहा से लातें है...! बसें है परमात्मा तो प्रकृति  के कण कण में, फिर क्यों "आरती " लेकर  मंदिरों और मजारों में वो जातें है...!!             आरती सुधाकर सिरसाट     ...

"नई शुरुआत"

चलों फिर से एक बार जिन्दगी से नई मुलाकात करते है...। जमाने के सारे दर्दो को मिटाकर फिर से एक नई शुरुआत करते है...।। बहुत रूलाया है इस जिन्दगी ने आओं हम भी थोड़ा इसे परेशान करते है...। कभी हसाते है कभी रूलाते है, आओं हम भी थोड़ा इसे हैरान करते है...।। छाएँ है जो तन्हाई के बादल इस जीवन पर आओं हम इन्हें तन्हाई से आजाद करते...। रूठी सी है जो ऐ दुनिया हम से, आओं फिर से इसे हम आबाद करते है...।। निराशा के अंधेरे में हम फिर से, आशाओं की एक नई लौ जलाते है...। छोड़कर गीले - शिकवे सभी से जिन्दगी को फिर से हँसाते है...।। चलों फिर से एक बार जिन्दगी से नई मुलाकात करते है...। जमाने के सारे दर्दो को मिटाकर फिर से एक नई शुरुआत करते है...।।                             आरती  सुधाकर सिरसाट       

"हिंदी"

  राष्ट्र का मान है सम्मान है हिंदी...! भारत की आन है पहचान है हिंदी...!! मीरा की कृष्ण के प्रति भक्ति है हिंदी...! सुरदास के सूर में शक्ति है हिंदी...!! निराशा में भी आशा की किरण है हिंदी...!! कभी शब्द तो कभी शब्दों का अर्थ है हिंदी...!! राधा कृष्ण के परिशुद्ध प्रेम की परिभाषा है हिंदी...! प्रकृति का मधुर स्वर है हिंदी..!! मानव की मानवता का अस्तित्व है हिंदी...! 'निराला' की कविता का रस है हिंदी...!! पवन की पुरवाई में समाई है हिंदी...! नभ की काली घटाओ में है हिंदी...!! माटी की खुशबू में महकती है हिंदी...! वीरों के लहू में धडकती है हिंदी...!!         ...आरती  सुधाकर सिरसाट